‘गण’ और ‘तंत्र’


‘तंत्र’ तो संगठित है पर ‘गण’ कहीं बिखरे पड़े,

तंत्र हमको लूटता है, गण हैं आपस में लड़े।

तंत्र तो पैदा हुआ था गण की सुविधा के लिए,

दास था जो क्यों मचलता स्वामी बनने के लिए।

बाँट रखा आज गण को स्वार्थ, जाति, धर्म ने,

और तंत्र को बाँध रखा लोभ, शक्ति, भ्रष्ट कर्म ने।

जो तंत्र का हो जाये गण, और गण का तंत्र हो,

तब कहीं जा कर भारतवर्ष में सही गणतंत्र हो।

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the authorRakesh
Well-versed in English literature, Rakesh is a teacher by profession and geek by heart with an ardent passion for all-things-tech. He has been a theme developer, modder and has contributed some custom ROMs. He enjoys learning, discovering, growing and sharing the newest and latest trends in the world of Android.
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