Poems

क्यूँ प्रेम पगे मेरे मन को

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Written by Rakesh

क्यूँ प्रेम पगे मेरे मन को

तुम ठेस लगाया करते हो,

खुद भी तुम आहत होते हो

मुझको भी रुलाया करते हो।

 

अधिकार नहीं मेरा कोई

तुम वर्जित फल मेरी ख़ातिर,

उस सुखद स्वप्न के जैसे तुम

जो हो ही नहीं सकता ज़ाहिर,

ये सब सच है माना मैंने

तुम क्यूँ जतलाया करते हो।

 

क्यूँ व्यर्थ में तुम उलझाते हो

कड़ियां इस पावन बन्धन की,

बस एक सुवास ही काफ़ी है

पहचान को चन्दन कानन की,

है स्नेह-प्रज्ज्वलित यह दीपक

क्यूँ प्रश्न उठाया करते हो।

 

क्यूँ प्रेम पगे मेरे मन को

तुम ठेस लगाया करते हो।

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